Table of Contents

Bhagavad Gita Chapters wise Quotes in Hindi

Bhagavad Gita Chapters
1. अर्जुन विषाद योग2. सांख्य योग3. कर्म योग
4. ज्ञान कर्म संन्यास योग5. कर्म संन्यास योग6. ध्यान योग
7. ज्ञान विज्ञान योग8. अक्षर ब्रह्म योग9. राजविद्या राजगुह्य योग
10. विभूति योग11. विश्वरूप दर्शिन योग12. भक्ति योग
13. क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग14. गुणत्रय विभाग योग15. पुरुषोत्तम योग
16. दैवासुर सम्पद विभाग योग17. श्रद्धात्रय विभाग योग18. मोक्ष संन्यास योग

श्रीमद् भगवद्गीता सप्तदश अध्याय – श्रद्धात्रय विभाग योग

भगवद्गीता का अध्याय 17 श्रद्धात्रयविभाग योग है। यह श्रद्धा, कर्म, यज्ञ, तप और दान के तीन प्रकारों का वर्णन करता है, जो सत्त्व, रजस और तम गुणों पर आधारित हैं। भगवान कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति की श्रद्धा गुणानुसार सात्त्विक, राजसिक या तामसिक होती है। सात्त्विक आहार हितकारी, रुचिकर, मधुर, स्निग्ध होता है; राजसिक चटपटा, अधिक नमकीन; तामसिक बासी, अशुद्ध। यज्ञ तीन प्रकार के—सात्त्विक शास्त्रोक्त फलत्यागी, राजसिक कामना वाला, तामसिक विधिविहीन। तप भी सात्त्विक शास्त्रोक्त, राजसिक दंभपूर्ण, तामसिक आत्मघातक।

श्रद्धा तीन प्रकार की है। आहार-यज्ञ-तप गुणानुसार विभक्त हैं। सात्त्विक श्रद्धा श्रेष्ठ है। तामसिक हानिकारक है। श्रद्धा ही कर्म का आधार है।

दान सात्त्विक उचित स्थान-काल पर फल न चाहकर, राजसिक नामप्रियता से, तामसिक अभिमान या अनुचित। ओम तत् सत् शब्द ब्रह्म के संकेत हैं—सात्त्विक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तप-दान-यज्ञ करते हैं। तामसिक नास्तिक बिना मंत्र के दान आदि देते हैं। शास्त्रोक्त कर्म ही सिद्धि देते हैं।

Quotes from Bhagavad Gita Chapter 17 – Śhraddhatraya Vibhaga Yoga

श्रीमद् भगवद्गीता अष्टादश अध्याय – मोक्ष संन्यास योग

भगवद्गीता का अध्याय 18 मोक्षसन्यास योग है। यह सभी उपदेशों का समापन करते हुए कर्म, ज्ञान, भक्ति, संन्यास और मोक्ष मार्ग का संक्षिप्त सार प्रस्तुत करता है। भगवान निष्काम कर्मयोग को श्रेष्ठ बताते हैं, जो बंधन न देता। ज्ञानयोगी कर्मफल का त्याग कर शुद्ध चित्त से भजन करता है। संन्यास चार प्रकार के—कामत्यागी श्रेष्ठ। वर्णाश्रम धर्म बताते हुए कहते हैं कि स्वधर्म ही श्रेयस्कर, परधर्म से हानि। सात्त्विक त्याग शास्त्रोक्त है। अर्जुन को स्वधर्म युद्ध ही करना चाहिए।

सभी योगों का समन्वय है। निष्काम कर्म-भक्ति से मोक्ष मिलता है। समर्पण ही परम शांति है। सर्वं नारायणाय समर्पय। यह गीता का अंतिम संदेश है।

कामना रहित भक्तियोग सर्वोत्तम है। भगवान कहते हैं—मामेकं शरणं गच्छ, सर्वपापविनाशक। श्रद्धा से योगी शुद्ध बुद्धि पाकर मोक्ष पाता। ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति। अर्जुन के संशय दूर होते हैं, वह भगवान को सब कुछ मानकर नमस्कार करता है। सभी को शास्त्रानुष्ठान और भगवद्भक्ति का उपदेश है।

भगवद्गीता का अंतिम श्लोक अध्याय 18 का श्लोक 78 है। यह संजय द्वारा धृतराष्ट्र को दिया गया उपसंहार है।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिः ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और धनुर्धारी अर्जुन हैं, वहाँ श्री (समृद्धि), विजय, भूति (गौरव) निश्चित है; मेरी यह निश्चित बुद्धि है।

Quotes from Bhagwat Geeta Chapter 18 – Mokṣha Sanyasa Yoga