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Bhagavad Gita Chapters wise Quotes in Hindi

Bhagavad Gita Chapters
1. अर्जुन विषाद योग2. सांख्य योग3. कर्म योग
4. ज्ञान कर्म संन्यास योग5. कर्म संन्यास योग6. ध्यान योग
7. ज्ञान विज्ञान योग8. अक्षर ब्रह्म योग9. राजविद्या राजगुह्य योग
10. विभूति योग11. विश्वरूप दर्शिन योग12. भक्ति योग
13. क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग14. गुणत्रय विभाग योग15. पुरुषोत्तम योग
16. दैवासुर सम्पद विभाग योग17. श्रद्धात्रय विभाग योग18. मोक्ष संन्यास योग

श्रीमद् भगवद्गीता त्रयोदश अध्याय – क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग

भगवद्गीता का अध्याय 13 क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग है। यह क्षेत्र (शरीर), क्षेत्रज्ञ (आत्मा) और ज्ञान के माध्यम से परम सत्य की प्राप्ति का वर्णन करता है। भगवान क्षेत्र को शरीर सहित पांच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त प्रकृति बताते हैं। क्षेत्रज्ञ आत्मा है जो क्षेत्र का भोक्ता और द्रष्टा है। पांच इंद्रियाँ और मन विषयों का सेवन करते हैं। सच्चा ज्ञान क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के विभाग को समझना है। जो इसे जान लेता है, वह भगवान को भी जान लेता है। अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षान्ति, सरलता, आचार्योपासन, शौच, स्थैर्य, आत्मविनिग्रह आदि ज्ञान के लक्षण हैं।

शरीर ‘क्षेत्र’ है, जानने वाला ‘क्षेत्रज्ञ’ है। ज्ञान के 20 लक्षण बताए गए हैं। परमेश्वर को जानना ही लक्ष्य है। क्षेत्रज्ञ ज्ञान मुक्ति देता है। विवेक आवश्यक है।

ज्ञानी तत्वज्ञान से इन्द्रियविशयों में आसक्ति रहित रहता है। वह सर्वत्र समदर्शन करता है। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विवाद से ऊपर उठकर परमात्मा को देखता है। प्रकृति से जीव का बंधन होता है, गुणों से कर्मफल मिलता है। जो सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि देखता है, वह न भास्करति। ऐसा ज्ञानी दुःखों से मुक्त होकर परम गति पाता है।
Quotes from Bhagwat Geeta Chapter 13 – Kṣhetra Kṣhetragya Vibhāga Yoga

श्रीमद् भगवद्गीता चतुर्दश अध्याय – गुणत्रय विभाग योग

भगवद्गीता का अध्याय 14 गुणत्रयविभाग योग है। यह प्रकृति के तीन गुणों—सत्त्व, रजस, तमस—के स्वरूप, प्रभाव और उनसे ऊपर उठने के मार्ग का वर्णन करता है। भगवान कृष्ण बताते हैं कि प्रकृति से उत्पन्न सत्त्वगुण ज्ञान और सुख देता है, रजोगुण कर्म और लोभ उत्पन्न करता है, जबकि तमोगुण अज्ञान और प्रमाद फैलाता है। ये गुण परस्पर क्रिया करते हैं—सत्त्व सुख से बांधता, रजस सकाम कर्म से, तमस आलस्य से। सत्त्वप्रधान मृत्यु पर स्वर्गलोक, रजसप्रधान मनुष्ययोनि, तमसप्रधान पशुयोनि मिलती है। गुणों के विवृद्धि के लक्षण जैसे प्रकाशोत्पत्ति सत्त्व के, चंचलता रजस के, मोह तमस के होते हैं।

सत्-रज-तम गुण बंधन का कारण हैं। गुणातीत होकर ब्रह्म प्राप्त करो। गुणों से ऊपर उठो। सात्त्विक भाव अपनाओ। गुणातीत ही योगी है।

गुणातीत पुरुष गुणों के उत्थान-पतन में विचलित नहीं होता, समदृष्टि रखता है। वह न तो गुणों से द्वेष करता, न आसक्त होता। भक्तियोग से अनन्य भक्ति करने वाला तीनों गुणों को पार कर ब्रह्मभाव प्राप्त करता है। भगवान ही ब्रह्म का आधार हैं, जो गुणातीत को शाश्वत पद देते हैं।

Quotes from Bhagavad Gita Chapter 14 – Guṇa Traya Vibhaga Yoga