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Bhagavad Gita Chapters wise Quotes in Hindi

Bhagavad Gita Chapters
1. अर्जुन विषाद योग2. सांख्य योग3. कर्म योग
4. ज्ञान कर्म संन्यास योग5. कर्म संन्यास योग6. ध्यान योग
7. ज्ञान विज्ञान योग8. अक्षर ब्रह्म योग9. राजविद्या राजगुह्य योग
10. विभूति योग11. विश्वरूप दर्शिन योग12. भक्ति योग
13. क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग14. गुणत्रय विभाग योग15. पुरुषोत्तम योग
16. दैवासुर सम्पद विभाग योग17. श्रद्धात्रय विभाग योग18. मोक्ष संन्यास योग

श्रीमद् भगवद्गीता पञ्चदश अध्याय – पुरुषोत्तम योग

भगवद्गीता का अध्याय 15 पुरुषोत्तम योग है। यह संसार रूपी अश्वत्थ वृक्ष, जीवात्मा की स्थिति और परम पुरुष के स्वरूप का वर्णन करता है। भगवान संसार को ऊर्ध्वमूल अधःशाखा अश्वत्थ वृक्ष के रूप में वर्णित करते हैं, जिसकी जड़ें ऊपर परमात्मा में हैं और शाखाएँ नीचे गुणों व इंद्रियों से फैली हैं। वेद इसके पत्र हैं, इसकी खोज कर मूल सहित काटना चाहिए। उस परम पद को जानो जहाँ पहुँचकर पुनरागमन नहीं होता, जो स्वयंप्रकाशी है और सूर्य-चन्द्र-अग्नि भी नहीं जानाते। जीवात्मा भगवान का सनातन अंश है, जो इंद्रिय-मन सहित शरीरों में विचरण करता है। वह शरीर छोड़ते समय इंद्रियें ग्रहण कर नया शरीर लेता है।

पुरुषोत्तम ही सर्वोच्च सत्य है। ब्रह्मा-विष्णु क्षणभंगुर हैं। उसकी शरण में आओ। अश्वत्थ वृक्ष का रहस्य समझो। पुरुषोत्तम अनादि है।

भगवान कहते हैं कि सूर्य, चंद्र, अग्नि का तेज मेरा ही अंश है। पृथ्वी में धारण करने वाला, औषधियों का पोषक सोम, प्राणियों में वैश्वानर अग्निरूप भोजन पचाने वाला वही हूँ। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ से परे दो पुरुष हैं—क्षर (परिवर्तनशील) और अक्षर (अविकारी); इनसे भी परे पुरुषोत्तम हूँ जो सबका संचालक है। जो मुझे इस रूप में जानता है, वह मायया पार होकर वैकुण्ठ प्राप्त करता है।
Quotes from Bhagavad Gita Chapter 15 – Puruṣhotama Yoga

श्रीमद् भगवद्गीता षोडश अध्याय – दैवासुर सम्पद विभाग योग

भगवद्गीता का अध्याय 16 दैवासुर संपद्विभाग योग है। यह दिव्य (दैवीय) और आसुरी गुणों का वर्णन कर भक्तों को दैवीय मार्ग अपनाने का उपदेश देता है। भगवान कृष्ण दैवीय गुण बताते हैं—निर्भयता, सत्त्वसम्पन्नता, दानशीलता, तप, यज्ञ, स्वाध्याय, क्षमा, सरलता, शौच, आचार्य भक्ति। ज्ञान, विवेक, वीर्य, क्षान्ति, दया, धृति, स्वाध्याय। दैवीय संपत्ति वाले जन्म से ही स्वर्गीय लोकों को जाते हैं और मोक्ष प्राप्ति के लिए शास्त्रानुष्ठान करते हैं। ये गुण आत्मिक उन्नति कराते हैं।

दैवी गुण मोक्ष देते हैं, आसुरी बंधन। सात्त्विक भाव अपनाओ। तामसिक त्याग दो। दैवी सम्पदा श्रेष्ठ है। आसुरी नरक की ओर ले जाती है।

आसुरी गुण हैं—दर्प, अभिमान, काम, क्रोध, क्रूरता, अज्ञान। आसुरी प्रकृति वाले स्वभाव से ही नरक के द्वार खोलते हैं। वे काम, क्रोध, लोभ से बंधकर जन्म-मृत्यु के चक्र में फँसते हैं। शास्त्रों का आश्रय न लेकर इन्द्रियसुखों में लिपटकर नष्ट होते हैं। इसलिए शास्त्रोक्त मार्ग से दैवीय गुण अपनाकर भगवत्प्राप्ति करो।

Quotes from Bhagavad Gita Chapter 16 – Daivāsura Sampad Vibhaga Yoga