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Bhagavad Gita Chapters wise Quotes in Hindi

Bhagavad Gita Chapters
1. अर्जुन विषाद योग2. सांख्य योग3. कर्म योग
4. ज्ञान कर्म संन्यास योग5. कर्म संन्यास योग6. ध्यान योग
7. ज्ञान विज्ञान योग8. अक्षर ब्रह्म योग9. राजविद्या राजगुह्य योग
10. विभूति योग11. विश्वरूप दर्शिन योग12. भक्ति योग
13. क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग14. गुणत्रय विभाग योग15. पुरुषोत्तम योग
16. दैवासुर सम्पद विभाग योग17. श्रद्धात्रय विभाग योग18. मोक्ष संन्यास योग

श्रीमद् भगवद्गीता एकादश अध्याय – विश्वरूप दर्शन योग

भगवद्गीता का अध्याय 11 विश्वरूप दर्शन योग है। यह भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को अपने विराट विश्वरूप का दर्शन कराने वाला अध्याय है, जो भगवान की अनंत शक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करता है। अर्जुन भगवान से अपने अविनाशी स्वरूप के दर्शन की प्रार्थना करता है। भगवान योगमाया से दिव्य दृष्टि प्रदान कर अपना विराट रूप दिखाते हैं, जिसमें अनंत मुख, नेत्र, भुजाएँ और भूषणों से सुशोभित तेजस्वी रूप है। अर्जुन इस रूप में समस्त सृष्टि को आदि, मध्य और अंत सहित देखता है, जिसमें देवता, ऋषि, गंधर्व, राक्षस सभी भयभीत होकर स्तुति कर रहे हैं। यह रूप हजारों सूर्यों के समान प्रदीप्त और भयंकर है, जिसमें कालरूपी भगवान सभी योद्धाओं का संहार कर रहे हैं। अर्जुन भगवान को सृष्टि का आधार, पालक और संहारक मानकर स्तुति करता है।

विश्वरूप दिखाकर श्रीकृष्ण कहते हैं – मैं ही सबका आधार हूँ। अर्जुन भयभीत हो भक्ति का आश्वासन पाते हैं। विश्वरूप सत्य का प्रमाण है। भक्त की रक्षा होती है। समर्पण आवश्यक है।

विश्वरूप देखकर अर्जुन भयभीत हो जाता है और भगवान से क्षमा मांगता है। भगवान कहते हैं कि यह रूप वेद, तप, यज्ञ या दान से नहीं देखा जा सकता, केवल भक्ति से ही प्राप्त होता है। वे स्वयं चतुर्भुज या सौम्य मानवरूप धारण कर लेते हैं। भक्तों को इस रूप की भक्ति करने से मोक्ष मिलता है, क्योंकि भगवान भक्तों के हृदय में निवास करते हैं। अर्जुन सौम्य रूप देखकर संतुष्ट हो जाता है और भगवान की महिमा का गुणगान करता है।

Quotes from Bhagwat Geeta Chapter 11 – Viśhwarupam Darshana Yoga

श्रीमद् भगवद्गीता द्वादश अध्याय – भक्ति योग

भगवद्गीता का अध्याय 12 भक्ति योग है। यह भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को सगुण और निर्गुण उपासना के बीच श्रेष्ठ भक्ति मार्ग का वर्णन करता है। अर्जुन पूछता है कि साकार भगवान के भक्त और निर्गुण अव्यक्त ब्रह्म के उपासकों में श्रेष्ठ कौन है। भगवान कहते हैं कि सगुण रूप (स्वयं) में अनन्य भक्ति करने वाले भक्त श्रेष्ठ हैं, क्योंकि निर्गुण साधना कठिन है। जो भक्त समस्त कर्मों को भगवान में अर्पित कर अनन्य योग से चिंतन करते हैं, वे शीघ्र मोक्ष पाते हैं। यदि मन स्थिर न हो तो अभ्यास, ज्ञान, कर्मफलत्याग से क्रमशः आगे बढ़ें। भगवान ऐसे भक्तों को संसार सागर से उद्धार करते हैं।

सगुण भक्ति निरगुण से सरल है। भक्त की सभी भावनाएँ उत्तम हैं। समर्पण ही भक्ति का फल है। भक्त मेरे प्रियतम है। भक्ति मार्ग अचूक है।

भगवान प्रिय भक्त के गुण बताते हैं: समः शत्रौ च मित्रे च, मानापमानयोः, शीतोष्णसुखदुःखेषु समः। न हृष्यति न द्वेष्टि, न शोचति न काङ्क्षति, शुभाशुभ परित्यागी। विविक्तस्थानुकंठः, अरतिर्जनसंस्यागी, अनभिष्वंगः, मातृवत्परदारेषु। ये गुणवान् भक्त भगवान को अति प्रिय हैं, वे निष्काम भाव से भक्ति कर मोक्ष प्राप्त करते हैं।

Quotes from Bhagwat Geeta Chapter 12 – Bhakti Yoga