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Bhagavad Gita Chapters wise Quotes in Hindi

Bhagavad Gita Chapters
1. अर्जुन विषाद योग2. सांख्य योग3. कर्म योग
4. ज्ञान कर्म संन्यास योग5. कर्म संन्यास योग6. ध्यान योग
7. ज्ञान विज्ञान योग8. अक्षर ब्रह्म योग9. राजविद्या राजगुह्य योग
10. विभूति योग11. विश्वरूप दर्शिन योग12. भक्ति योग
13. क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग14. गुणत्रय विभाग योग15. पुरुषोत्तम योग
16. दैवासुर सम्पद विभाग योग17. श्रद्धात्रय विभाग योग18. मोक्ष संन्यास योग

श्रीमद् भगवद्गीता सप्तम अध्याय – ज्ञान विज्ञान योग

Srimad Bhagawad Geeta के सातवें अध्याय में Bhagwan Shree Krishna अपनी विभूतियों और प्रकृति का वर्णन करते हैं। भगवान को जानने के लिए अनन्य भक्ति और योगाभ्यास आवश्यक है। प्रकृति के आठ अंग हैं – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, अहंकार। जीव भी भगवान की परम प्राकृतिक शक्ति है। माया के तीन गुण – सत, रज, तम – संसार को बांधते हैं।

भक्ति से ईश्वर को जानना संभव है। प्रकृति और जीव के स्वरूप समझो। माया के बंधन से भगवान छुड़ाते हैं। उनकी शरण ही मुक्ति है। भक्त प्रभु के निकटतम है।

चार प्रकार के भक्त भगवान की शरण लेते हैं – आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी। ज्ञानी भक्त सबसे श्रेष्ठ है। आसुरी प्रवृत्ति वाले भगवान को जानने में असमर्थ रहते हैं। योगमाया से भगवान स्वयं को प्रकट करते हैं। अनन्य भक्त ही भगवान को संपूर्णता से जान पाते हैं।

Quotes from Bhagavad Gita Chapter 7 – Gyana Vigyana Yoga

श्रीमद् भगवद्गीता अष्टम अध्याय – अक्षर ब्रह्म योग

Srimad Bhagawad Geeta के आठवें अध्याय में अर्जुन Bhagwan Shree Krishna से परम ब्रह्म, अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ तथा मृत्यु काल में स्मरण की विधि पूछता है। भगवान कहते हैं कि परम ब्रह्म अविनाशी है, अक्षर परमात्मा सबका आधार है। जो साधक जीवन भर भगवद्भक्ति करते हुए अंत समय में भगवान का स्मरण कर मरते हैं, वे परम धाम को प्राप्त होते हैं।

स्मरण के लिए योगी को अभ्यास और वैराग्य से मन को नियंत्रित करना चाहिए, ताकि प्राणायाम और ध्यान द्वारा चित्त एकाग्र हो। जो भक्त नियमित भजन कीर्तन करते हैं, वे सहज ही भगवान नाम का स्मरण कर लेते हैं।

मृत्यु काल में भगवान का स्मरण करो। नित्यकर्म और योग से परम धाम मिलता है। भक्ति मार्ग प्रशस्त होता है। स्मरण ही मुक्ति का द्वार है। निष्काम भक्ति करो।

भगवान श्री कृष्ण तीन प्रकार के मार्ग बताते हैं: तपस्वी तप से चंद्रलोक, यज्ञ करने वाले इंद्रलोक, ज्ञानी ब्रह्मलोक जाते हैं। ये सब नाशवान हैं, केवल भगवत्स्मरण से ही अविनाशी परम पद मिलता है। जो मेरे भक्त हैं, वे जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर मेरा ही धाम पाते हैं।

मेरी भक्ति सर्वोत्तम है, जो यज्ञ, दान, तप से भी श्रेष्ठ है। सभी वेदों का परम लक्ष्य वही है, इसीलिए भक्तों को निरंतर भगवान स्मरण में लगना चाहिए।

Quotes from Bhagavad Gita Chapter 8 – Akṣhara Brahma Yoga