Category: Poem

फिर से !!!!!!

फिर से ,फिर से ,आज फिर से; छलनी हुआ देश का सीना फिर से; रक्त लारियों से  भींगी धरती फिर से;  आतंक लौट कर आया इक बार फिर से;                       किसका दोष ,किसकी चूक ,पूंछे हम किससे ;                        हृदय मद्य घुसा है शूल फिर भी बैठे है चुप से;                        दहशत चहुओर और चेहरे

कौन है वो …..

ससी आभा युक्त कनक मुख; देंख क्यो दिल हर्षाता है; क्यों हर अदाओ मे; रति छाया दिख आता है| मटकती-मटकती आँखो से जब वो निहारे है; निपट अकेले मे भी,संग हमेशा पाता हूँ; कविता लिखते-लिखते,तस्वीर बना जाता हूँ; चोरी-चोरी नज़रों से,एक झलक की चाहत मे; बार-बार निगाहें छत पे क्‍यों चली जातीं हैं; सुखते कपड़ो

आम युवा का ज्वार- कौन हूँ मैं |

कौन हूँ मै ? शायद जबाब ना मिले ,सिर्फ मुझे ही नही ,मुल्क के तमाम युवा को भी शायद जबाब चाहिए! आखिर कौन हैं हम सब ?? वो जो रोज खुद से लड़ता है ,अपनी असफलता पर खिंजता है..अपने दोष किसी और पर मढ़ने की कोशिश में लगा रहता है… सराय काले खा के फुटपाथ पर सोये बेघरो को देख कुढ़ता है,अन्दर ही अन्दर रोता

प्रेम – विरह

सागर था इक हँशियों का ; गोते लगाया करते थे ; दर्रा बना खामोशी का; पाटने में लगे रहते है | जल-परी थी जो सागर की ; उखड़ी -उखड़ी रहती है; क्या गिला ,कौन-सा शिकवा ; ना कुछ कहती है ,बस चुप -चुप सी रहती है | हर आहट से होता उसका एहसास ; हर

कैसी ये टिश-टिशी!!!!!!!!!!!!!!!!

आँखे हैं धुआ-धुआ; दिल भी क्यों भरा-भरा; आज क्यों,ज़ज्बात यूँ हावीं हैं, क्यों बेचैनी अजीब सी; कुछ चुभा तो है, जिसकी है ये टिश-टिशी| कुछ दिन पहले  की तो बात है; हम कितने खुशमिजाज थे; क्या हुआ,कैसे बँधे यूँ मोह-फांश मे; के जाते ही उनके बेकरार होने लगे; आना भी उनका, तो ना अजीब था;

मैं ” मेड” हूँ

मैं कोई पेड़ नहीं,कोई खेत नही , ना खलिहान हुँ ,ना बगीचा. .मैं तो हूँ खेतों में समृद्धि के पानी रोकने वाला . .जिस पर बैठ किसानों ने घाम सुखाये .. जिसने खुद पर जख्म खा कर माली के उपवन बचाये .. .जिन पर चल कितनो ने मंजिल को पाये… पर जब भी मैं महत्वाकांक्षा

मदनीय

नव समर से अपरचित , अपनो से दूर,तनिक था विचलित, निपट सोच मे गुन -धुन,गुन -धुन, रूनझुन-रूनझुन नुपूर प्रतिध्यनि ने ध्यान बँटाया; शोभित श्यामसुंदरी पग मे, आकस्मात दृष्टि चरणदृिशठ हो आया, पग शैली से ही चंचल, शोख अदा,कोकिल स्वर, स्वच्छन्द भाव और आल्हरपन, मुख भावों पर प्रादर्शित निश्चल मन, मयूरसीखा सी मदनीय, उन्मूक्त मन तरंग

ओह्ह्ह !!!!! ये चुनाव ..

ये चुनाव कई फूल मुरझाएगा; वतन की टहनियाँ काट कर ही मानेगा; इकरंगी पत्तियों को भी झंडों के रंग लगाएगा; बित भले जाए,पर कड़वाहट घोल ये जाएगा एक-दूसरे की खींचने मे लगे,देश रौंद कर जाएँगे; ये रंग मेरा-वो तुम्हारा करते-करते,किंचित भारत बेरंग कर जाएँगे; इसकी टोपी-उसकी टोपी के झाले मे,हमरी पगड़ी उछालेंगे; बीत भले ये

गाम परदेशिया

मिथिला,मैथिली, मातृपदेश ; भागि  गेल  छलहूँ  परदेश ; बड्ड अख्क्षेलाहूँ ,अहुछिया कटलाहूँ  ; फेर आयल हमरा होश ; आ घुरी ऐलाहूँ  अपना देश ; बस उतैरते माथ धुरी लगेलहूँ ; पेलहूँ  प्राण ,आशीष आ स्नेह ; गामक मंदिर घंटिक स्वर; महुआक गंध ,आ कोयलिक कुक ; पुलक तर सँ  बहैत कमला बलान ; ग्रामक द्वार “बंशी बाबू

जिसको जो-जो करना ,उसको वो-वो करने दो ,भारत को तो भइया ऐसे ही रहने दो |

 क्या खाएं ,क्या ना खाएं ,क्या पहने ,क्या ना पहने ,क्या कुछ भी लिखें ,या जो मन में आये बोल दें. अपने choice को चुनें या choose कर अपना choice  बनाये . बहुत confusion है भाई ,सामान्य से भी अति  सामान्य….अरे यों कहो मूढ़ बनकर शांति से जीने में भी बहुत criticality आ गई है.