अमर शहीद सुखदेव थापर
भारत महान जहाँ एक तरफ ज्ञानी जनों और ऋषियों मुनियों की धरती रही है वही दूसरी तरफ एक से बढ़कर एक अद्भुत और साहसी वीरों – शुरवीरों ने भी इसी पावन भूमि से जन्म लिया हैं। भारतीय इतिहास के पन्ने ऐसे ही शुरवीरों से भरें पड़े है। उन्ही वीरों में से एक नाम सुखदेव थापर जी का है जिनके नाम से ही ब्रिटिश शासन के अधिकारियों के हाथ पैर कांपने लगते थे। आईए जानते है अमर शहीद सुखदेव थापर जी के बारे में इस पोस्ट Sukhdev Thapar Biography in Hindi में। :-
Sukhdev Thapar Biography in Hindi
सुखदेव थापर की जीवनी
शहीद सुखदेव थापर को भारत के सच्चे सपूत के रूप में याद किया जाता है। महान शहीद सुखदेव थापर भारत के आजादी की लड़ाई के अग्रणी सिपाही थे, उन्होंने भारत की स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाई। शहीद सुखदेव नें निडर होकर अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ी और भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया।
सुखदेव थापर का जन्म
सुखदेव थापर का जन्म 15 मई वर्ष 1907 को पंजाब के लुधियाना जिले के एक पंजाबी खत्री परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम रामलाल थापर और माता जी का नाम रल्ली देवी था। सुखदेव के पिता की मृत्यू के पश्चात उनके देख-रेख उनके चाचा लाला अचिन्तराम जी ने किया था।
सुखदेव का बचपन
सुखदेव का बचपन एक साधारण हिन्दू परिवार के बच्चे की तरह ही गुजरा। पढ़ाई में सुखदेव अच्छे थे, साथ ही साथ खेलकुद में भी उनकी काफी रुचि रहती थी। भारत में उस समय के माहौल में साधारण जनता अंग्रेजी शासन से त्रस्त थी और स्वतंत्रता संग्राम के सिपाहियों को अपना हर तरह से सहयोग करती थी। सुखदेव भी बचपन से ही स्वतंत्रता के लिए दिए गए वीरों के बलिदानों के बारे में सुना और पढ़ा करते थे।
सुखदेव के चाचा लाला अचिन्तराम जी स्वतंत्रता आंदोलन में गहरी रुचि रखते थे और बढचढ़ कर हिस्सा लेते थे। अपने चाचा और उनके आसपास के अन्य लोगों के साथ रहकर और उनकी बातों को सुनकर, सुखदेव के मन में भी बाल्यकाल से ही देशभक्ति की भावना हिलोरें मारने लगी थी।
सुखदेव थापर का स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होना
शहीद सुखदेव थापर ने अपने जीवन के बाल्यकाल में ब्रिटिश शासन के द्वारा किए जा रहें अत्याचार और अन्याय को काफी नजदीक से देखा था। धीरे धीरे उनकी रुचि भी स्वतंत्रता की क्रांति में बढ़ने लगी थी और उन्होंने भी सक्रिय रूप से अंग्रेजों की खिलाफत करना शुरू कर दिया। फिर उन्होंने स्थानीय क्रांतिकारी संगठनों के कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से भाग लेना शुरू कर दिया था।
युवाओं को स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के लिए प्रेरित करने के लिए सुखदेव थापर ने नौजवान भारत सभा (Naujawan Bharat Sabha) नामक एक संगठन शुरू किया जो स्वतंत्रता संग्राम सहित विभिन्न गतिविधियों में शामिल था। नौजवान भारत सभा का मुख्य लक्ष्य युवाओं को स्वतंत्रता की लड़ाई मे बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने के लिए उत्साहित करना था और सदस्य बनाना था। सुखदेव लाहौर के नेशनल कॉलेज में छात्रों से मिल कर उनको स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के लिए प्रेरित किया करते थे।
महान क्रांतिकारी सुखदेव
इसके साथ ही उन्होंने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Socialist Republican Association) के सक्रिय सदस्य के रूप मे काम करना शुरू कर दिया। Hindustan Socialist Republican Association अंग्रेजों के खिलाफ काम करने वाला वो संगठन था जो स्वतंत्रता संग्राम में सशस्त्र प्रतिरोध करने मे यकीन रखता था और अंग्रेजी शासन को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए दिलों जान से लगा था।
HSRA में सुखदेव ने बहुत जल्दी ही अपनी धाक जमानी शुरू कर दिया और बहुत तेजी से संगठन में उभरने लगे। बहुत जल्द ही सुखदेव को पंजाब इकाई का प्रमुख बना दिया गया। ब्रिटिश शासन से लोहा लेने सुखदेव और संगठन के सदस्य पूरे पंजाब और उत्तर भारत में भी कई जगह जा जा कर हमला करते रहते थे। ऐसा कहा जाता है की सुखदेव के प्रमुख बनने के बाद संगठन और भी मजबूत होने लगा था और सभी सदस्य उनके नेतृत्व कौशल का लोहा मानते थे।
सुखदेव, भगत सिंह और राजगुरु जैसे क्रांतिकारियों से मिलकर और भी बेखौफ रूप से अंग्रेजों से लोहा लेने लगे। बर्ष 1929 में जेल की भूख हड़ताल आंदोलन में भी सुखदेव का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
18 दिसम्बर वर्ष 1928 में लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए सुखदेव, भगत सिंह और राजगुरु ने साथ मिलकर, लाहौर में ब्रिटिश शासन में पुलिस अधिकारी जेपी सॉन्डर्स (JP Saunders) की हत्या कर दी। इस घटना को लाहौर साजिश (Lahore Conspiracy Case) के रूप में जाना जाता है।
सुखदेव, भगत सिंह और राजगुरु की फांसी
8 अप्रैल वर्ष 1929 में सुखदेव, भगत सिंह और राजगुरु को ब्रिटिश पुलिस ने नई दिल्ली के सेंट्रल असेंबली हॉल पर बमबारी करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया और उनपर मुकदमा चलाया गया। उसके बाद तीनों स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी की सजा सुना दी गई। 23 मार्च वर्ष 1931 को सुखदेव, राजगुरु और भगत सिंह को लाहौर सेंट्रल जेल में फाँसी दे दी गई और जनता के उग्र आंदोलन की आशंका के कारण तीनों वीर सपूतों के शवों को को गुपचुप तरीके से सतलज नदी के किनारे अंतिम संस्कार कर दिया गया।
सारांश
शहीद सुखदेव थापर एक युवा क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने हिंदुस्तान की आजादी के आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई। सुखदेव थापर “नौजवान भारत सभा” के संस्थापक सदस्य थे जो युवाओं को स्वतंत्रता संग्राम मे भाग लेने के लिए प्रेरित करती थी। फिर श्रीमान, भगत सिंह और राजगुरु के साथ “हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन” के एक प्रमुख सदस्य के रूप में उभरें और बाद मे पंजाब इकाई के प्रमुख बनकर संगठन को और मजबूत किया।
ब्रिटिश शासन से से खुलेआम विद्रोह करते हुए सुखदेव और HSRA के साथियों ने कई ऐसे साहसी कार्य किए जो इतिहास में अमर रहेंगे। लाहौर साजिश (Lahore Conspiracy Case) और नई दिल्ली के सेंट्रल असेंबली हॉल पर बमबारी कुछ ऐसे काम है जिसने ब्रिटिश सत्ता के जड़ों को हिला डाला था।
8 अप्रैल 1929 को सुखदेव और उनके साथियों भगत सिंह और राजगुरु को ब्रिटिश पुलिस ने नई दिल्ली के सेंट्रल असेंबली हॉल पर बमबारी करने के आरोप में गिरफ्तार कर उनपर मुकदमा चलाया। उसके बाद 23 मार्च 1931 उन तीनों स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी दे दी गई।
मात्र 23 वर्ष की आयु में ही सुखदेव थापर देश के लिए शहीद हो गए। सुखदेव थापर को भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नायक के रूप में सदैव याद और नमन किया जाएगा।
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