70 साल के गण और गणतंत्र का सच

70  वें स्वतंत्रता दिवस  पूर्वसंध्या पर ,जब पीछे मुड़ कर देखने का मन  किया तो शायद अग्नि का प्रदर्शन और अनुशासित  सैन्य बिरादरी ही याद  आया । चमचमाती गाड़ियाँ ,विभिन्न झाकियां और “इंडिया गेट” पर जमी सभ्य भीड़ तथा  प्रधानमंत्री जी  का अभीभाषण (जिनमे जोर सरकारी नीतियों को न्यायसंगत बनाने पर होता है) सुनकर ,यह उत्सव ,मात्र एक उत्सव या अपने पर इठलाने का आयोजन लगने लगता है ।

इस आयोजनों  पर शायद ही किसी को संविधान की नीतियों ,लोकतंत्र के स्तंभों और सुदृढ़ बनाने के उपायों ,उन्हें परखने के अवसरों अथवा अपने बीते 70 बरस का सिंहावलोकन का ख्याल आया हो ।

तो क्या यह दिन मात्र अपने सामरिक शक्ति प्रदर्शन या उल्लास मनाने का एक मौका मात्र बन कर रह गया है ।

क्या एक बार  अपने आपको गणतंत्र घोषित करने के बाद हमारा कोई उत्तरदायित्व शेष नहीं रहता ??

क्या सिर्फ संविधान को अंगीकृत कर लेना मात्र गणतंत्र हो जाना है???

गणतंत्र का मतलब है ऐसी शासन प्रणाली जिसमे हर कोई समान रूप से भिगीदार हो।

सरकार,शासन ,और संविधान की वास्तविक कुंजी आम लोगो के पास हो ।

हर समस्या और समाधान दोनों का केंद्रबिंदु आम गण होना चाहिए ।संविधान के आधारभूत सिधान्तों का वास्तविक अंगीकरण तभी संभव है जब शासन व्यवस्था “सर्वेभवन्तु सुखिना” को अपनाये और लागु करे ।

परन्तु क्या हम जश्न मनाने से पहले एक बार भी धरातालिये सच्चाई को स्वीकार अथवा जानने की कोशिश करते हैं??

गणतंत्र के मौलिकता आम लोगो से है पर क्या कभी आम जन के हालात सुधारना तो छोडो ,जानने की भी जेहमत उठाई ??

नियम और कानून बनाना आसान अहि पर उनकी उपयोगिता और अनुकरण करना या करवाना उससे कही मुश्किल।

अधिकारों को घोषणा मात्र से आम गणों को अधिकार नही मिल जाते और यदि मिल भी जाये तो उनका ईमानदारी और शुद्धः अन्तः करण से इस्तेमाल एक कठिन कार्य होता है।

क्या इन बिते 70 सालों में हमने अपने इन मुद्दों पर कभी नजर फिराया है??

कभी भी धुल-फांकती अधिकारों और कर्तव्यों की मोटी-मोटी (अपने ही बनाये )दस्तावेज को पलटना उचित समझा ???

पुनः अवलोकन ही सही मायने में सम्पूर्णता और ईमानदार नियत की परिचायक होता है।

तो क्या 70 बरस बाद भी हमारी सोच शुद्ध  हो पाई है????

क्या हम पूरी हृदयता और  उदारता से गणतंत्र को अंगीकृत कर पाये हैं???

शायद नहीं ।हम अभी भी इतने व्यस्क नहीं हो पाये है।अभी -भी आम गणों की माली हालात में कुछ खास बदलाव नहीं आये  हैं।

क्या हम ऐसे व्यस्क मानसिकता  वाले लोकतंत्र के रूप में अपने आपको स्थापित कर पाये हैं जहाँ चाहुओर समरसता और समानता का बयार बह रहा हो???

क्या हमारे यहाँ सही मायने में मौलिक अधिकारों के साथ आम आदमी जी रहा है???

क्या हमारे मुल्क में वो ताकत है की हम हार्दिकता के साथ m .f hussain और सलमान रुश्ती को गले लगा सके??

क्या हमारे गणतंत्र की मौलिकता यही है की किसी किसी पिछड़ी या अल्पसंख्यक का समग्र विकास न कर उन्हें आरक्षण अथवा तुष्टिकरण की नीति अपना कर “वोट बैंक “की तरह इस्तेमाल करे।

कभी हमने सोचा की हमारा गणतंत्र क्यों अपने ही घर से विस्थापित कश्मीरी पंडितो को उसका हक नहीं दिला पता ??

शायद कमजोरी हमारी नियत में है या फिर हम अपनी कमजोरी पर से परदा ही नहीं उठाना चाहते ।जिन पर उतरदायित्व को बोझ है ,शायद वो कंधे उच्च महत्वाकांक्षा नहीं करे ।

कमजोरी अप्रशिक्षित आम गणों का भी है जो केंद्र बिंदु होने के वावजूद पृथ्वी की क्रोड की भांति मजबूत नहीं बन पाये और अपना ही दुरूपयोग करा रहे है ।

आम गणों लोकतंत्र के अभ्यासी बनाने का दायित्वों जिस बुद्धजीवी वर्ग पर था …. या तो सुप्त पड़ा है अथवा लोभ लोलुपता  के कारण अपनी जबान नहीं खोल पा रहा है।

अंततः सवाल एक ही है जो की अंतिम सत्य है की क्या गणतंत्र का सही मतलब हमें समझ में आया है या फिर हम ऐसे ही आन्दोत्सव का ढिंढोरा पिट कर आत्म-मुग्घ होते रहते हैं।

अब जबकि 70 बरस हो चुके ,जरूरत है “जब जागा तभी सबेरा “को चरितार्थ करते हुए जाग जाने की ।

अन्ना आन्दोलन और अन्य समग्र जनांदोलनो ने इसकी हल्की आभा दिखाई दी है परन्तु अपेक्षानुरूप सफल नहीं हो पाना चिंताजनक स्थिति का संकेत है।

अतः जरूरत है ईमानदारीपूर्वक लोकतान्त्रिक मूल्यों को पुनः स्थापित करने की ।

गणतंत्र की जड़ो को खोदकर उन्हें सिंचित करने की और ईमानदारी की उर्वरक देकर मजबूत बनाने की।

आम गणों को लोकतंत्र का देवता समझ ,ऐसी नीतियाँ बनाने और अनुपालन करने की ,ताकि आम जन अपने को ठगा महसूस ना करें।

तुष्टिकरण की बजाय संतुष्टीकरण और वोट बैंक की जगह “हृदय सम्राट ” बनाने पर जोर देना होगा ताकि लोकतंत्र की आत्मा जिन्दा रहे और आम लोगो का विश्वास गणतंत्र में बना रहे और वो गणतंत्र दिवस पर क्रिकेट खेल या t .v देख बिताने की बजाय ,राष्ट्र संबोधन सूनने को आतुर हो।

तभी सही मायने में हम 26 जनबरी को मनाने के हकदार हैं और अधिकारी भी।

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