गंगा च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती |  नर्मदे सिंधु कावेरी जलेस्मिन संनिधिम कुरु || पढ़ते कभी ना सोचा था की धन्यवाद् ज्ञापन करते ये हाथ ,वशुधैव कुटुम्बकम  से सिंचित हमारे  भाव ,कभी इसी नदी के खातिर मारने –मरने पे उतारू हो जायेंगे | विगत और वर्त्तमान कुछ काल-खंड में  सर्वोच्च न्यायलय के “आपसी उपभोग-अनुपात” पर