डॉ.जाकिर हुसैन

Zakir Husain

डॉ .जाकिर हुसैन

( राष्ट्रपति1967 से 1969)

 

डॉ .जाकिर हुसैन का जन्म

डॉ.जाकिर हुसैन
डॉ.जाकिर हुसैन

डॉ० जाकिर हुसैन’ का जन्म 8 फरवरी, 1897 को हैदराबाद में हुआ था। उनके पिता का नाम फ़िदा हुसैन खान था। इनका जन्म एक संपन्न पठान परिवार में हुआ था और जन्म के कुछ ही वर्ष बाद जाकिर हुसैन का परिवार हैदराबाद छोड़ उत्तर प्रदेश के फरुखाबाद जिले के कायमगंज में रहने चला गया था। यद्यपि उनका जन्म भारत में हुआ था, परन्तु उनके परिवार के पुराने इतिहास को देखा जाय तो ये वर्तमान पश्तून जनजाति वाले पाकिस्तान और अफगानिस्तान के सीमावर्ती इलाकों से सम्बन्ध रखते थे. यह भी कहा जाता है कि उनके पूर्वज 18वीं शताब्दी के दौरान वर्तमान पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आकर बस गए थे. जब वह केवल 10 वर्ष के थे तो उनके पिता चल बसे और 14 वर्ष की उम्र में उनकी माँ का निधन हो गया था.

 

 

डॉ.जाकिर हुसैन की शिक्षा

डॉ० जाकिर हुसैन की प्रारंभिक शिक्षा इस्लामिया हाई स्कूल, इटावा में हुई। आगे की पढ़ाई के लिए वे अलीगढ़ में एंग्लो-मुहम्मडन ओरिएंटल कॉलेज (जो आजकल अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के रूप में जाना जाता है) में दाखिला लिया. यहीं से उन्होंने एक युवा सुधारवादी राजनेता के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत की |

 

वे एक व्यावहारिक और आशावादी व्यक्तित्व के इंसान थे। डॉ. जाकिर हुसैन उच्च शिक्षा के लिए जर्मनी गए थे परन्तु जल्द ही वे भारत लौट आये | वापस आकर उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया को अपना शैक्षणिक और प्रशासनिक नेतृत्व प्रदान किया |

 

डॉ. जाकिर हुसैन का राजनैतिक सफ़र

जाकिर हुसैन को अलीगढ़ के एंग्लो-मुहम्मडन ओरिएंटल कॉलेज में अध्ययन के वर्षों के दौरान से ही एक छात्र नेता के रूप में पहचान मिली। राजनीति के साथ-साथ उनकी दिलचस्पी उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी थी |

 

अपनी औपचारिक उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद वे 29 अक्टूबर, 1920 को उन्होंने कुछ छात्रों और शिक्षकों के साथ मिलकर अलीगढ़ में राष्ट्रीय मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना की (वर्ष 1925 में यह यूनिवर्सिटी करोल बाग, नई दिल्ली में स्थानांतरित हो गयी) | दस वर्षों बाद यह फिर से यह जामिया नगर, नई दिल्ली में स्थायी रूप से स्थानांतरित कर दी गयी और इसका नाम जामिया मिलिया इस्लामिया रखा गया | इस समय जाकिर हुसैन मात्र 23 साल के थे |

 

विश्वविद्यालय वर्ष 1927 में बंद होने के कगार पर पहुँच था, लेकिन डॉ. जाकिर हुसैन के प्रयासों की वजह यह शैक्षिक संस्थान अपनी लोकप्रियता बरकरार रखने में कामयाब रहा| उन्होंने लगातार अपना समर्थन देना जारी रखा, इस प्रकार उन्होंने इक्कीस वर्षों तक संस्था को अपना शैक्षिक और प्रबंधकीय नेतृत्व प्रदान किया| उनके प्रयासों की वजह से इस विश्वविद्यालय ने ब्रिटिश शासन से भारत की आजादी के लिए संघर्ष में योगदान दिया |

 

एक शिक्षक के रूप में डॉ. जाकिर हुसैन ने महात्मा गांधी और हाकिम अजमल खान के आदर्शों को प्रचारित किया। उन्होंने वर्ष 1930 के दशक के मध्य तक देश के कई शैक्षिक सुधार आंदोलन में एक सक्रिय सदस्य के रूप में कार्य किया|

 

जाकिर हुसैन की गहरी रुचि और समर्पण, राजनीति की तुलना में शिक्षा के प्रति अधिक था, जिसका स्पष्ट प्रमाण उनका अर्थशास्त्र में पीएचडी की डिग्री के लिए जर्मनी जाना था | जब वे बर्लिन विश्वविद्यालय में थे तो उन्होंने प्रसिद्ध उर्दू शायर मिर्जा खान गालिब के कुछ अच्छे शायरियों का संकलन किया था |

 

जाकिर हुसैन का विचार था कि शिक्षा का मकसद अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई के दौरान भारत की मदद के लिए मुख्य उपकरण के रूप उपयोग करना था। वास्तव में जाकिर हुसैन का भारत में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लक्ष्य के प्रति इतना समर्पण था कि वे अपने प्रबल राजनीतिक विरोधी मोहम्मद अली जिन्ना का भी ध्यान अपनी तरफ खींचने में सफल रहे|

 

डॉ० जाकिर हुसैन ने शिक्षा सुधार के क्षेत्र में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई। 1956 में वह राज्यसभा अध्यक्ष के रूप में चयनित हुए। 1957 में वह बिहार राज्य के गवर्नर नियुक्त हो गए और राज्यसभा की सदस्यता त्याग दी। 1962 से 1967 तक वे देश के उप-राष्ट्रपति भी रहे।

 

डॉ .जाकिर हुसैन का राष्ट्रपति बनना

13 मई, 1967 को वह देश के तीसरे राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित हुए।

 

डॉ जाकिर हुसैन को राष्ट्रपति चुनाव में मिला वोट

डॉ .जाकिर हुसैन को राष्ट्रपति चुनाव में 4,71,224 वोट |

 

डॉ .जाकिर हुसैन को मिला सम्मान

डॉ. जाकिर हुसैन को वर्ष 1954 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया |

शिक्षा और राजनीति के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने के लिए वर्ष 1963 में उनको सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न‘ से सम्मानित किया गया।

दिल्ली, कोलकाता, अलीगढ़, इलाहाबाद और काहिरा विश्वविद्यालयों ने उन्हें डि-लिट् (मानद) उपाधि से सम्मानित किया था.

 

डॉ. जाकिर हुसैन का निधन

भारत के राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेने के दो साल के बाद ही 3 मई, 1969 को डॉ. जाकिर हुसैन का निधन हो गया | वे पहले राष्ट्रपति थे जिनका निधन कार्यकाल के दौरान ही हुआ | उन्हें नई दिल्ली में जामिया मिलिया इस्लामिया (केन्द्रीय विश्वविद्यालय ) के परिसर में दफनाया गया है | वे एक महान शिक्षाविद होने के साथ-साथ नेतृत्व क्षमता में भी बेजोड़ थे। भारतीय राजनैतिक और शैक्षिक इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए उन्हें सदैव याद किया जाएगा।

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