गोपाल कृष्ण गोखले की जीवनी

गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 9 मई 1866 रत्‍‌नागिरी के कोटलुक गाँव में हुआ था | गोपाल कृष्ण गोखले भारत के स्वतंत्रता सेनानी थे साथ ही वे एक महान समाजसेवी, विचारक एवं समाज सुधारक थे। गोपाल कृष्ण गोखले के पिता का नाम कृष्णराव था और माता का नाम सत्यभामा था |

 

उनका जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था इसके बाबजूद उनके पिता ने उनकी पढाई लिखाई का पूरा ध्यान रखा और सदाचार की शिक्षा उन्हें बचपन से ही दी | परन्तु भाग्य को कुछ और ही मंजूर था और उनके बाल्यावस्था में ही उनके पिता का असमय स्वर्गवास हो गया | पूरा परिवार अस्थ्व्यस्त हो गया |

 

गोपाल कृष्ण गोखले की पढाई लिखाई पर भी बहुत असर पड़ा | वो अपने पिता पर ही आश्रित थे ऊपर से उनका उम्र भी बालकाल का था | ऐसे समय में उनके बड़े भाईसाहब गोविन्द कृष्ण ने 15 रुपैये की नौकरी पकड़ी और परिवार का भरण पोषण करने लगे | 15 रुपैये में से 8 रुपैये गोपाल कृष्ण गोखले को वो देते थे ताकि वो अपनी पढाई पूरी कर सके |

 

गोपाल कृष्ण गोखले पर भी आगे बढ़ने का , अपने देश के लिए कुछ करने का ऐसा जूनून था की उस कठिनाई के वक़्त भी उनका हौसला कम नहीं हुआ | 8 रुपैया प्रतिमाह में उनका गुजारा, उनकी पढाई सब होती थी | कई बार ऐसा भी हुआ की गोखले को भूखा सोना पड़ा लेकिन उन्होंने अपनी पढाई से कोई समझौता नहीं किया |

 

बचपन से ही गोखले अंग्रेजी , गणित, अर्थशास्त्र और इतिहास में काफी रूचि रखते थे और इन्ही विषयों में आगे जाकर उनका पकड़ काफी मजबूत हो गया और लोग उनका लोहा मानने लगे | गोखले ने मुंबई के एलफिंस्टन कॉलेज में दाखिला लिया और सफलतापूर्वक 1884 में उन्होंने अपना स्नातक उत्तीर्ण किया |

 

पढाई पूरी करने के बाद उन्होंने शिक्षा का मार्ग चुना और 1885 में पूना के न्यू इंलिश स्कूल में शिक्षक बन गये | इसी बिच में बाल गंगाधर तिलक के उनकी जान पहचान हुई और तिलक ने उनको डेक्कन एज्युकेशन सोसायटी में जुड़ने के लिए प्रेरित किया | गोखले 1886 में डेक्कन एज्युकेशन सोसायटी के स्थायी सदस्य बने | एक तरह से 1886 में गोखले ने राजनीती में कदम रखा | डेक्कन एज्युकेशन सोसायटी के सदस्य के रूप में अपने कामो के लिए वो बहुत प्रसिद्ध होने लगे | आमजन के साथ साथ स्वंतन्त्रता आन्दोलन के सदस्य भी उनको जानने लगे |

 

गोखले ने 1887 में फर्ग्युसन कॉलेज में अंग्रेजी और इतिहास विषय के अध्यापक बने और वहां भी उनके बिषय पर प्रभुत्व के कारन बहुत प्रसिद्ध हुए | उसी दौरान वो महादेव गोविन्द रानाडे के संपर्क में आये और गोखले पर उनका ऐसा प्रभाव पड़ा की गोखले, गोविन्द रानाडे को आपना गुरु मानने लगे | आगे के वर्षो में गोखले ने जो भी किया उसमे गोविन्द रानाडे की प्रेरणा और उनके विचारो बहुत बड़ा हाथ था |

 

गोपाल कृष्ण गोखले ने 1888 मे एक दैनिक अखबार सुधारक में अंग्रेजी विभाग के संपादक के तौर पर जिम्मेदारी संभाली | इस दौरान वो अब राजनीती और समाज में एक जाना पहचाना नाम बन चुके थे | उनके हर उम्र के लोगो द्वारा बहुत ही सम्मान से देखा जाने लगा | राजनीती में उनका काफी प्रभुत्व हो गया | वर्ष 1889 मे गोखले ने औपचारिक रूप से राष्ट्रीय कॉग्रेस की सदस्यता ग्रहण की |फिर वो 1890 में सार्वजानिक सभा के सचिव चुने गये |

 

गोखले वर्ष 1898 में पूना नगरपालिका के सदस्य बने फिर आगे जाकर वे पूना नगरपालिका के अध्यक्ष भी बने | गोखले 1902 में इम्पीरियल विधान परिषद के निर्वाचित किए गए । गोपाल कृष्णा गोखले वर्ष 1905 मे कांग्रेस के अद्ययक्ष चुने गये और उसी वर्ष उन्होंने सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसायटी की स्थापना की | इस संस्था का मुख्य उद्देश्य गरीबो और पिछडो का कल्याण करना और ऐसे ही गरीबो के कल्याण के लिए काम करने वाले और लोगो को तैयार करना था |

 

वर्ष 1905 में ही  गोखले आजादी के पक्ष में अंग्रेजों के समक्ष लाला लाजपतराय के साथ इंग्लैंड गए और वहां 45 दिन तक रह कर उन्होंने अत्यंत प्रभावी ढंग से देश की स्वतंत्रता की बात रखी।

 

गोपाल कृष्ण गोखले का संपर्क महात्मा गाँधी से हुआ और उनके बुलावे पर गोखले 1912 में अफ्रीका गए और वहां रह रहे भारतीयों के ख़राब स्थति के बिरोध में प्रभावी ढंग से आवाज उठाया | अफ्रीका से लौटने पर महात्मा गांधी भी गोखले के साथ ‘सर्वेट्स ऑफ इंडिया सोसायटी’ से जुड़ गये |महात्मा गाँधी, गोपाल कृष्ण गोखले से इतने प्रभावित थे की उन्होंने सार्वजानिक रूप से गोखले को अपना राजनितिक गुरु मान लिया और आजीवन उनके शिष्य बने रहे |

 

महात्मा गाँधी ने गोपाल कृष्ण गोखले के लिए जो कहें , इसी से हम उनके बारे में आसानी से समझ सकते है, उनका कितना सम्मान और आदर था |

” मुझे भारत में एक पूर्ण सत्यवादी आदर्श पुरूष की तलाश थी और वह आदर्श पुरूष मुझे गोखले की रूप में मिला. उनके ह्रदय में भारत के प्रति सच्चा प्रेम और वास्तविक श्रद्धा थी. वे देश की सेवा करने के लिए अपने सारे सुखो और स्वार्थ से परे रहे. ” – महात्मा गाँधी

 

गोपाल कृष्ण गोखले ने अपना सारा जीवन देश और समाज की सेवा में अर्पित कर दिया | खराब स्वस्थ के कारण 19 फ़रवरी 1915 उनका देहावसान हो गया |गोपाल कृष्ण गोखले अपने कार्यो और आदर्शो के कारण सदा अमर रहेंगे | हमारा नमन भारत देश के ऐसे महान सुपुत्र को |

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