मदनीय

नव समर से अपरचित ,

अपनो से दूर,तनिक था विचलित,

निपट सोच मे गुन -धुन,गुन -धुन,

रूनझुन-रूनझुन नुपूर प्रतिध्यनि ने ध्यान बँटाया;

शोभित श्यामसुंदरी पग मे,

आकस्मात दृष्टि चरणदृिशठ हो आया,

पग शैली से ही चंचल,

शोख अदा,कोकिल स्वर,

स्वच्छन्द भाव और आल्हरपन,

मुख भावों पर प्रादर्शित निश्चल मन,

मयूरसीखा सी मदनीय,

उन्मूक्त मन तरंग मे लहराती,

खंजन खग सी फुद्फुदति ,

शिशु-कर कंगन की खन-खन,स्मारित  हो आई;

नीरज-पत्रक पर ओंश बूँद सी,

ओष्ठ-कोण  जब वो दबाती,

केश-लटों को घुमाती,बातें बनाती;

शशि प्रकाशित कुमुद,,दिन मे ही दिख आई;

कुसुंभ कस्तूरी घटा,आते ही छाया,

चकित चाँद सब,वो चकोर सी,

उन्मुक्त चित्रक्षी वो,मोहित सब चित्रवत,

घूर रहे हैं यंत्रवत,

अनभिज्ञ इनसे,रमी मस्त वो,

अपने मे ही खोई|

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