बृद्धाश्रम के युग में गो-रक्षा

बृद्धाश्रम के युग में गो-रक्षा

गो-वंश ,गो-रक्षा काफी चर्चा में हैं ..आज कल जब आदमी की कोई पूछ नही उस समय गो-वंश की इतनी चिंता पे मन काफी हर्ष में था और सिर्फ हर्ष ही में नही वरन उससे भी ज्यादा ..सामान्य हिन्दू मानविकी के कारण श्रद्धा में था …
फिर भी कुछ दिन से सोच रहा था की क्या ये चर्चाएँ वाकई गो -रक्षा की हैं या इसमें कुछ “घाल-मेल ” है तो अंततः पता चला की इसमें तो धर्म की चाशनी चढ़ी है ..
तो क्या इन चर्चाओ के बीच हम गो-रक्षा का मतलब समझ पा रहे हैं….और तभी किसी दिन इक खबर किसी जगह सुना अथवा देखा की एक पुत्रवधू ने अपनी असहाय और बीमार सास की cctv लगे घर में बड़ी निर्दयता से मारा-पीटा …
तभी मुझे वास्तविकता का ,गो-रक्षा का ज्ञान हो गया और यह संपूर्ण अभियान मात्र “तथाकथित “और “गुब्बारा “मात्र लगने लगा .
इसलिए नही की मैं कठोर ,निर्दयी या मांस का आदि हूँ (जैसा की कुछ लोग इसे पढ़ने से पहले कल्पित करें )   अथवा तथाकथित  “धर्मनिरपेक्षता ” या “वामपंथी बुद्धिमत्ता” का आवरण ओढ़ रखा हो या उसपर दम्भ हो (जोकि आज कल फैशन है ..संस्कृति को गाली-वामपंथ और धर्म से अतिरेक -धर्मनिरपेक्षता )…
.मैं तो बस आम धार्मिक पर  सामान्य ज्ञान से युक्त व्यक्ति हूँ जो साफ -साफ देख पा रहा है की ये समग्र अभियान  वास्तविकता और आम जन के सीधे सहयोग (वैचारिक सहयोग अलग बात है )के बगैर बिना धरातलीय सच्चाई से अवगत हुए बगैर  खड़ा किया गया है…
वर्तमान परिवेश में जहाँ एकाँकी परिवार और व्यकिगत हित हमारी सभी नैतिकताओं और विचारों पर हावी हैं …फलतः “श्रवण कुमार ” के इस देश में वृद्धाश्रम आम होते जा रहे हैं,    वहाँ बूढी,असहाय और बीमार गो-वंश जो आर्थिक रूप से देश के सबसे आर्थिक-विपन्न “किसान” पर ‘बोझ’ बन रही हो ,उन्हें मार देना ही मेरी समझ में श्रेष्ठकर होगा ..
ये न सिर्फ गो-वंश को उपेक्षा ,तरस्कार और कठिनाइयों से “मोक्ष ” दिलाएगा वरन किसानो को भी समृद्धि के कुछ धुँट दे जायेगा (जोकि सूखे मौसम में वरदान की तरह है )..साथ ही समाज को प्रोटीन ,दवा और चमड़ा दे जाएगी …रोजगार और पूंजी का इक चक्र निर्मित करेगी ..अतः ये इक तरह से euthenesia भी है और अंग-दान भी |
बातें हम कितनी भी बड़ी-बड़ी क्यों न कर ले वो वास्तविकता की धरातल पर तभी टिकती हैं जब उनमे आदर्श कम और यथार्थ ज्यादा हो …
और यथार्थ यही  है की जहाँ अपने पीछे छूट रहे ..आदमी के जीवन का मोल कम होता जा रहा है वहाँ कोई किसी जानवर को कहाँ पूछता है  (चाहे हमारी धार्मिक ग्रथ उसे कितना भी पवित्र क्यों न माने )  ..
धर्म सबका पेट (नेतओं को छोड़ कर …धार्मिक नेता भी ) थोड़े न  ..भरती  है …
वैसे भी best can survive  और” समृद्धि संग सहयोग” ज्यादा वास्तविक और वैज्ञानिक है ..
भाई गो-रक्षा तो तब होगी जब किसान समृद्ध हो और वो तब होगा  जब उनपर से बोझ कम हो..
सही गो-रक्षा तो तब भी होगी जब उन्हें उनके कष्टों सहित जीने पर मजबूर ना किया जाये …
रही बात मांस की तो जिन्हे जो खाना है खाने दो तुम्हारी थाली से  तो कुछ नही लिया और दिया जा रहा है ..
और बात  दुधारू की तो वास्तविक और सच यही है की उन्हें कोई बेचेगा ही नही तो रक्षा अभियान की कोई जरूरत ही नही,,
इतनी सामान्य सी बात में धर्म,राजनीती ,मिडिया और आज कल तो “साहित्य ” भी घुसेड़ा जा रहा है जबकि ये तो मात्र जरूरत को समझने की सामान्य अर्थशास्त्र ,थोड़ा सा मनोविज्ञान और सामाजिक अध्ययन है …
खैर…ये बातें कौन समझना चाहता है…जहाँ आवेग हो…जवान बुद्धि vartual और digital के शोर में खोया हो..वहाँ वास्तविकता कहाँ दिखती है..

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