दया याचिका -मानवता या अन्याय Mercy Petition

ऐतिहासिक निर्णय द्वारा sc ने 15  लोगों के फाँसी की सज़ा को उम्र क़ैद मे बदल दिया जाना |

अब प्रश्न यह है की क्या यह एक उदाहरणीये कदम है या उन नि:अपराध लोगों के साथ अन्याय जो उनके द्वारा समयपूर्व काल के गाल मे समा दिए गये.

इन तमाम वाद-विवादों मे पड़ने से पहले हमे चाहिए की हम क्षमादान को समझे ,उसके उदेश्यों को समझे ओर किस तरह दी जाती है उसे जाने ,तो खुद-ब-खुद सारी दुविधा दूर हो जाएगी.

जब किसी को फाँसी दी जाती तो मात्र किसी को मार देना ही काफ़ी नहीं होता,अपराध अगर RAREST OR RARE  हो,अपराधी विभस्त अपराध करने के बाबजूद शर्मिंदा ना हो या अपराध मानवता को शर्मिंदा करनेवाला हो(ipc302) तभी दी जा सकती है.

तो फिर क्षमादान क्यो?

इसका उत्तर हमे अपने संविधान मे मिलता है article-72,article-161 के तहत राष्ट्रपति और राज्यपाल को क्षमादान का अधिकार प्रदान करता है.परन्तु मृत्युदंड के क्षमादान की शक्ति मात्र राष्ट्रपति को ही है.

सर्वप्रथम यह जाने की यह एक न्यायिक प्रकिया(judicial process) नही है,यह एक कार्यपालिक प्रक्रिया (executive process) है.

कोई भी राष्ट्रपति अपनी इच्छा मात्र से क्षमादान नहीं  दे सकता है,अत: यह अधिकार अनन्य या सर्वोपरि नहीं  है.इसमे शासन का मत अर्थात जनता का मत छुपा है.

तो प्रश्न की आख़िर क्षमादान क्यों??

जबकि हमारी सर्वोच्च न्यायालय ने किसी को दोषी ठहराया है.

इसका उत्तर हमारे लोकतंत्र(democracy) में छुपा है|

क्षमादान मूलत: हमारी सांविधानिक बाध्यताओं के उपर “जनमत”(people’s will) की सर्वोच्चता है.(क्योकि राष्ट्रपति कार्यपालिका

जोकि आम जनता के मत का प्रतिनिधित्व करता है के सुझावोनुसार ही क्षमादान पर फ़ैसला लेता है|(sc ने ये बात कई बार स्पष्ट किया है-maru ram vs union of india case,dhananjay chatarjee vs UNI, ranga-billa case..etc).

दूसरा यह मात्र grace है जो किसी अपराधी को उसके परिस्थितियों के अनुरूप दिया जाता है ना की कोई अधिकार है और इसका मूलमंत्र हमरी ऐतिहासिक संस्कृति मे है जो कहता है की “नफ़रत पाप से करो पापी से नही”,सो परिस्थीतिवश अगर कोई अपराध करता है(सुंदर सिंह …जोकि चरित्रवान् होकर भी दौरे मे आकर अपराध किया)तो उसे एक छोटा मौका तो मिलना चाहिए क्योंकि हमारी संपूर्णा न्यायिक व्यवस्था “सुधारात्मक है ना की दंडात्माक”.

अंत मे यह प्रणाली न्याय के क्रम मे हुई किसी भी त्रुटि को अंत तक सुधारने का अंतिम प्रयास है.

अत: क्षमादान हमें मानवता को बचाने ,नैतिकता और नैसर्गिक मानवीय मूल्यों,करुणा और क्षमा करने का मौका देती है

परंतु ये भी कटु सत्या है की ये सारी दलीले और उच्च मानक निर्दोषों,भुक्ताभिगीयों और पीड़ितों के आक्रोश और दुख को ना कम कर सकती है ओर ना न्ययसंगत ठहरा सकती है,लेकिन हमे यह अवश्य द्‍यान रखना चाहिए की क्षमा ना सिर्फ़ हमारी संस्कृति ओर सभ्यता है वरन हमारा बड़प्पन और महानता भी.

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