कौन है वो …..

ससी आभा युक्त कनक मुख;
देंख क्यो दिल हर्षाता है;
क्यों हर अदाओ मे;
रति छाया दिख आता है|

मटकती-मटकती आँखो से जब वो निहारे है;
निपट अकेले मे भी,संग हमेशा पाता हूँ;
कविता लिखते-लिखते,तस्वीर बना जाता हूँ;
चोरी-चोरी नज़रों से,एक झलक की चाहत मे;
बार-बार निगाहें छत पे क्‍यों चली जातीं हैं;
सुखते कपड़ो से ही,स्पर्श अनुभव हो आतीं हैं|

 

कामों मे उलझी-उलझी ही,जब वो केशों का मुकुट बनाती है;
श्याममुख से इक घाम बूँद टपक आती है;
सुलझा-सुलझा, मैं क्यो उलझ-सा जाता हूँ;
स्वेद-बूँद को सुधा समझ;
क्यो तृष्णा मे जल उठता हूँ|

 

जब भी घुड़ता देख मुझे,वो मुस्काती है;
ओष्ठ कोण मे हँसी लिये,गुस्सा दिखती है;
चंद्रकांतिक मुख में;
निशकाल मे भी,क्यों नवप्रभात दिख जाता है|

 

दूसरों से बाते करते करते;
जब वो मुझे निहारे है;
खड़े-खड़े ही बैठ -सा जाता हूँ;
एक अदनी सी नज़ारो से;
मैं क्यो स्थिल हो जाता हूँ|

 

ऊठपटांग हरकतों पे मेरे,क़हक़हे लगा जब वो हँसती ;
कहाँ होती है,ना है भान;
पर बाँछे मेरी हैं खिल उठती;
बालक सा और गुलातियाँ भरता हूँ;
उसको हर्षित देख, क्यों इतना सुख पता हूँ|

 

संबंध कैसा,कौन सी पड़ी है गाँठ;
बँधा पता हूँ,रात,दोपहरी पहरों आठ;
ना है कोई अनुभव, ना इल्म खास;
लागे है,फिर भी चंद्रा-चकोर सा साथ;
ना बुझती,बस बढ़ती जाती है,कैसी ये प्यास?
कल्पित ही ना हो पाता;
ना कोई पल,ना कोई परिवेश;
खुदसे,खुदमे,क्यों लगता ;
रह गया है कुछ शेष;
कौन है वो,किसका धरा है वेष;
ना समझु,बस इतना जानू;
वो मेरी,मैं उसका;
बाकी सब अवशेष;

-Ravi kashyap

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