कुपोषण Malnutrition

आर्थिक मोर्चे पर भारत बेशक संवृद्धि के झंडे गाड़ रहा हो, लेकिन कुपोषण कई दशकों से यहाँ एक प्रमुख सामाजिक-आर्थिक चुनौती बना हुआ है। हाल ही में, कुपोषण का मुद्दा एक बार पुनः चर्चा में तब आया जब अंग्रेजी पत्रिका ‘दि इकोनॉमिस्ट’ (The Economist) ने यूनिसेफ द्वारा जारी ‘रैपिड सर्वे ऑन चिल्ड्रन’ (RSOC) 2013-14 के आँकड़ों का खुलासा रिपोर्ट आने से पहले ही कर दिया। इन आँकड़ों से पता चलता है कि भारत में कुपोषण और 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु के मामलों में काफी कमी आई है। लेकिन, देश में आर्थिक संवृद्धि के जो दावे किये जा रहे हैं, उन्हें देखते हुए कुपोषण अब भी एक शर्मनाक समस्या बना हुआ है।

Malnutrition1 सामान्यतः अफ्रीकी देशों को हम भारत की अपेक्षा गरीब और मानव विकास के पैमानों पर पिछड़ा हुआ मानते हैं। लेकिन भारत में कुपोषण की समस्या कितनी गंभीर है, इसका अनुमान आर.एस.ओ.सी. के इसी आँकड़े से लगाया जा सकता है कि भारत में अपनी आयु के अनुपात में कम वजन वाले बच्चों की संख्या कई अफ्रीकी देशों की तुलना में दोगुनी है। गैर-सरकारी संगठन ‘सेव द चिल्ड्रन’ द्वारा 2013 में जारी ‘फूड फॉर थॉट’ रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 6.14 करोड़ बच्चों का कद (Height) वैश्विक मानकों के अनुसार उनकी आयु के अनुपात में कम है, अर्थात् उन्हें ‘नाटे कद का’ (Stunted) कहा जा सकता है। लेकिन नाइजीरिया जैसे कथित रूप से पिछड़े देश में मात्र 1.09 करोड़ बच्चे ‘नाटेपन’ (Stunting) के शिकार हैं। इसके लिये यह तर्क दिया जा सकता है कि नाइजीरिया की जनसंख्या भारत की अपेक्षा बहुत कम है, हालाँकि वहाँ की प्रति व्यक्ति आय और आर्थिक प्रगति के मानक भी भारत से बहुत पीछे हैं।

खतरे की घंटी

देखा जाए तो कुपोषण की यह स्थिति भारत के लिये चिंताजनक है और एक बड़ी आर्थिक शक्ति बनने के भारत के प्रयासों की राह में यह बड़ी बाधा भी बन सकता है। बेशक तमाम विशेषज्ञ यह अनुमान लगा रहे हैं कि भारत के पास कार्यशील युवा जनसंख्या बहुत अधिक है और 2030 तक भारत में लगभग 48.5 करोड़ युवा जनसंख्या होगी। इसी कारण जबरदस्त आर्थिक प्रगति के अनुमान भी लगाए जा रहे हैं। लेकिन इस संबंध में यह सवाल उठता है कि इसमें से कितना कार्यबल स्वस्थ होगा, और यदि वह स्वस्थ नहीं होगा तो जी.डी.पी. (GDP) को कितना नुकसान होगा? 2012 में विश्व बैंक द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार स्वच्छता की कमी और कुपोषण के कारण होने वाले रोगों की वजह से भारत हर साल तकरीबन 53.8 अरब डॉलर गँवा देता है, जो 2006 के सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) के 6.4 प्रतिशत के बराबर है। हैरत की बात है कि इस पैमाने पर भारत, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे देशों से बहुत पीछे है, जहाँ जी.डी.पी. का क्रमशः 2.3 प्रतिशत और 1.5 प्रतिशत ही इसकी भेंट चढ़ता है। इसलिये, कुपोषण आर्थिक लिहाज से भी खतरे की घंटी है।

‘द वर्ल्ड फैक्ट बुक’ द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार, भारत में 5 वर्ष से कम आयु के 43.5 फीसदी बच्चे ऐसे हैं जिनका वजन सामान्य से कम है। इसके अनुसार, सामान्य से कम वजन वाले बच्चों की सर्वाधिक संख्या के मामले में भारत की स्थिति अत्यंत पिछड़ी हुई है, और वह ‘तिमोर-लेत्से’ के बाद दूसरे स्थान पर है। इस मामले में जहाँ पड़ोसी देशों- भूटान (12.8), नेपाल (29.1), पाकिस्तान (31.6) तथा बांग्लादेश (36.8) की स्थिति भी भारत से बेहतर है, तो ब्रिक्स के अन्य सदस्य देशों- ब्राजील (2.2), चीन (3.4) और दक्षिण अफ्रीका (8.7) की स्थिति भारत की अपेक्षा बहुत बेहतर है।

कुपोषण के कारण

  • पारिवारिक खाद्य असुरक्षा
  • महिलाओं में निरक्षरता
  • स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपलब्धता
  • स्वच्छ पेयजल की अनुपलब्धता तथा गंदगी
  • लड़कियों का कम उम्र में ही विवाह होना और जल्दी माँ बनना
  • बच्चों को पोषाहार नहीं मिलना
  • माँ को बच्चे की पोषाहार संबंधी आवश्यकताओं की जानकारी नहीं होना

बचाव के तरीके

यदि बच्चों को जन्म के बाद से ही पोषाहार दिया जाए, तो बेहद कम खर्च में कुपोषण पर नियंत्रण पाया जा सकता है। इसके लिये, सरकारी और व्यक्तिगत स्तर पर निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं-

1. नवजात को पोषाहार- सभी नवजात शिशुओं को जन्म के 1 घंटे के भीतर ही माँ का दूध पिलाना चाहिये। इसके अलावा, उन्हें तीन-चार दिन में दूध के साथ पर्याप्त पोषक पदार्थ भी दिये जाएँ। छह महीने तक शिशुओं को केवल माँ का दूध ही दिया जाए।

2. बच्चों को पोषक आहार- छह महीने के बाद से शिशुओं को पूरक आहार दिया जा सकता है, जिसमें दाल का पानी आदि भी हो सकता है और बाजार में उपलब्ध डिब्बाबंद प्रोटीन और विटामिन युक्त आहार भी।

3. किशोरियों को आयरन- किशोरियों को आयरन की गोलियाँ देना आवश्यक है ताकि वे रक्ताल्पता (Anaemia) की शिकार न हो जाएँ। स्वस्थ शिशु के जन्म के लिये यह अत्यंत आवश्यक है।

4. स्वच्छता का ध्यान- यदि झुग्गियों में और बच्चों के आसपास सफाई का पूरा ध्यान रखा जाए तो संक्रमण से अधिकाधिक बचा जा सकता है और इससे बच्चों का स्वस्थ विकास भी सुनिश्चित हो सकता है।

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