कावेरी का कुरूक्षेत्र हो जाना

गंगा च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती |  नर्मदे सिंधु कावेरी जलेस्मिन संनिधिम कुरु ||

पढ़ते कभी ना सोचा था की धन्यवाद् ज्ञापन करते ये हाथ ,वशुधैव कुटुम्बकम  से सिंचित हमारे  भाव ,कभी इसी नदी के खातिर मारने –मरने पे उतारू हो जायेंगे |

विगत और वर्त्तमान कुछ काल-खंड में  सर्वोच्च न्यायलय के “आपसी उपभोग-अनुपात” पर आधारित फैसले जिसमे कर्नाटक को १० मिलियन क्यूबेक लीटर पानी तमिलनाडु को देने को कहा गया है ,और उसके बाद जिस तरह बिना किसी तर्क-वितर्क ,न्यायलय के सम्मान ,मानवीय भाव और पडोशी होने के नैतिक भाव को भी तिलांजलि देते हुए हिंसा हो रही है और जिस तरह (जैसा की भारतीये राजनितिक दलों के लिए आम रहा है )प्रोत्साहित किया गया वो ना सिर्फ निंदनीय वरन  मूलभूत सिद्धन्तों से भटकाव और “अपनी मांग (चाहे वो नाजायज ही क्यों न हो ) को किसी हल में पूरा करने की जिद “मात्र को परिलक्षित करते हैं |

कावेरी ट्रिब्यूनल और बाद में न्यायलय में अपने तर्कों को साबित ना कर पाने की ये खीझ जिस रूप में सार्वजनिक संपत्ति के नाश का कारन बना है वो समझ से परे है  और ये कोई पहली दफा नहीं है इस तरह के प्रदर्शन हम अनेकों बार देख चुके हैं चाहे वो जाट आन्दोलन हो या फिर पाटीदार आन्दोलन ,हर किसी ने लोकतंत्र के नाम पर लोकतंत्र के अभिन्न अंग न्यायपालिका को हो उखाड़ना चाहा |

न्यायलय का निर्णय किसानों को तत्काल रहत और तकनिकी दक्ष तरीके से पानी का  आपस में वितरण मात्र था ,लेकिन इसमें राष्ट्रवाद ,भाषा और धर्म कहा दे आ गया |

जो लोग या गुट किसानो के बेहतरी के नाम पर हिंसा और मार –काट मचाये हैं उनका किसानी ,खेत या पानी से दूर दूर का रिश्ता तक नही है ,वे तो मात्र बहती कावेरी में स्वार्थ रुपी हाथ धोना चाहते हैं |

पता नहीं ये कैसा राष्ट्रवाद है जो  एक ही देश के दो राज्यों में कटुता ला रही है ,ये कैसी भाषा की लड़ाई है जो सांस्कृतिक युग्म का वाहक ना बन तोड़ का कारन बन रही है |

मिडिया ,राजनितिक पार्टिया जिन्हें कावेरी के उद्गम -अस्त का पता नही वे trp और वोट बैंक की लालसा में और भड़का रहे हैं ,किसी दुसरे राज्य में जाकर अगर कोई रोजगार कर या दे रहा या को पर-भाषी आपकी पड़ोस में हो तो तो क्या राष्ट्रवाद के नाम पर उसे उत्पीडित कर कावेरी का प्रवाह बढ़ जाएगा,इस तरह के कटुता और असहिष्णुता को देख कर तो पतित-पावनी का सूखने का मन करेगा |

अतः जरूरी है की एक शुद्ध तकनिकी और सामाजिक समस्या को भावनाओं के प्रवाह में डुबोने से अच्छा ,सरकार को इन पर बांध लगाना चाहिए,नफ़रत के जहर को उगलते साँपों के फन  को प्रशासनिक  दक्षता से कुचल देना चाहिए |

समस्या के पूर्णतः समाप्त करने हेतु एक मैनेजमेंट कमेटी बनायीं जाये ,कावेरी के प्रवाह और जल वितरण पर लगातार नजर रखने हेतु एक रेगुलेटिंग बॉडी हो जो पुर्णतः पेशेवर तरीके से निपटाए ताकि इन सब की नौबत ही न आये..

अंततः आम जन से अपील की अपने धर्म,नैतिकता और भारतीय गुणों को जगाये रखे ,अगर हम ऐसे ही आपस में लादे तो ब्रम्हपुत्र पर बन रहे चीनी बांध पर कैसे अंगुली उठा पाएंगे ,क्योकि उस हालात में कई अंगुलियाँ हमारे ओर ही होंगी |

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