ओह्ह्ह !!!!! ये चुनाव ..

ये चुनाव कई फूल मुरझाएगा;

वतन की टहनियाँ काट कर ही मानेगा;

इकरंगी पत्तियों को भी झंडों के रंग लगाएगा;

बित भले जाए,पर कड़वाहट घोल ये जाएगा

एक-दूसरे की खींचने मे लगे,देश रौंद कर जाएँगे;

ये रंग मेरा-वो तुम्हारा करते-करते,किंचित भारत बेरंग कर जाएँगे;

इसकी टोपी-उसकी टोपी के झाले मे,हमरी पगड़ी उछालेंगे;

बीत भले ये जाए,विभाजन-बूँ फैला कर ही जाएँगे;

कभी शवों के दम लगाते,कभी घड़ियाली आंशु बहाते,”साले” हमे डूबा जाएँगे;

“तेरा”,”मेरा” के वंचन में,”हम” को चौराहे पे लाकर ये निरीह छोर जाएँगे;

जहर उगलते-उगलते,भारत ज़हरीला किए बिना ये ना मानेंगे;

ओह्ह्ह्ह!!! ये चुनाव बीतता क्यों नही,अब क्या हमे नोंक-नोंच खाएँगे.

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